Monday, July 6, 2020

मुझे फ़र्क पड़ता है

                                                                                                                                              ०५/०७/२०२०


हज़ारों मरते हैं रोज़
कोरोना से या किसी और कारण से,
मुझे फर्क पड़ता है
केवल किसी अपने के जाने से ।

मजबूर कर दिया आज कलम उठाने को 
ऐसे ही किसी अपने की जुदाई ने,
वरना आत्मा तो जैसे खो गई थी 
विपदाओं की गहराई में ।

meना 

Monday, March 30, 2020

नई ज़िंदगानी

२७/०३/२०२०

प्रिय मित्रों 🙏
अभी  हाल ही में lockdown के दिनों में बारिश हुई थी । उसी एक सुबह मैंने जो महसूस किया उसी को इस कविता के ज़रिये पेश कर रही हूँ ।आशा करती हूँ आपको पसंद आएगी ।



हवा की आज रवानी देखी 
बनती नई ज़िंदगानी देखी ।

जवाँ दिख रहीं थीं पत्तियाँ पेड़ों पे,
हवा ले रही थी ताज़ा  साँसें ।
ऐसे गा रहे थे पंछी गगन में,
मानो प्रकृति का  जन्मदिन मना रहे थे ।
हवा की आज रवानी देखी 
बनती नई ज़िंदगानी देखी ।

क़ैद थे इंसान घरों में,
व्यस्त अपनी  दिनचर्या में ।
वातावरण शुद्ध हो रहा था, 
पुनर्जनम उसका हो रहा था ।
हवा की आज रवानी देखी 
बनती नई ज़िंदगानी देखी ।

meना 

Sunday, March 22, 2020

जनता कर्फ्यू

२२/०३/२०२०

प्रिय पाठकगण,
आज की यह कविता जनता कर्फ्यू से प्रेरित होकर लिखी है। आशा करती हूँ आप सबको पसंद आएगी।🙏


बैठती तो रोज़ ही होगी मुंडेर पर,
चहकती भी होगी शायद ।
लोगों के शोरोगुल में,
सुनाई कम देती होगी हमें ।

आज सुबह उसके ही,
चहकने से आँख खुली ।
खिड़की से झांका सन्नाटा था,
आदमी एक ना आधा था ।

केवल सुरक्षा कर्मी सुनाई दिए,
फ़र्ज़ ने उनको बांधा था ।
जनता कर्फ्यू ने हम सबको, 
घरों में अपने बिठाया था ।

आज न कोई बंदूक चलेगी,
ना कहीं बम फूटेगा ।
जान पे बन आई है यारों,
ख़ाक कोई कुछ लूटेगा ।

अलग थी विचारधारा जिनकी,
थे मतभेद जिनके मन में ।
एक स्वर में बोल रहे हैं,
एकजुट अब हो गए हैं ।

 जो काम कोई कर न सका वह,
एक विषाणु ने कर दिखाया ।
हम सब को एक छत के नीचे,
लाके खड़ा अब कर दिया ।

कुदरत तेरे खेल निराले !
कैसे कैसे खेले खेले ।
मानवता का सबक सिखाने,
नित-नए रंग तू है बदले ।

ऐ मानव! अब तो जाग,
फ़र्ज़ से अपने ऐसे ना भाग ।
कुदरत ने जो तुझे दिया है,
उसका संतुलन ना बिगाड़ । 🙏

meना 




Wednesday, March 4, 2020

सूफियाना दिल 🙏

०४/०३/२०२०


१) 
आ मिल मुझसे 
कि आमिल बन जा ।
छोड़ मैं के जमेले 
और कामिल बन जा ।

२) 
बनना, बनाना छोड़ 
और हस्ती मिटा ।
खुदा से खुद को जोड़ 
और मस्ती लुटा ।

**आमिल- फकीर 
    कामिल- पूर्ण 

meना 🙏

Monday, February 24, 2020

पा-गल

२४/०२/२०२०

            पा-गल 


पा-गल, पा-गल सब कहें,
गल पाया न कोय।
जो गल रब की समझ गया,
ते पागल रह्या न कोय।

meना 
(संत कबीर के दोहों से प्रेरित होकर।)
(Inspired by Sant Kabir's verses)

Thursday, February 13, 2020

इश्क़ वाला वायरस

                                                                                     १३/०२/२०२० 

प्रिय पाठकगण,
नमस्कार। वर्ष २०२० की मेरी पहली कविता उन प्रेमियों को समर्पित है जिनका प्रेम प्रति वर्ष फ़रवरी महीने में वैलेंटाइन्स के दिनों में बढ़ जाता है। इससे मेरा किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का उद्देश्य कतई नहीं है।  



                                                                                       


कई युवक युवतियों को अपनी चपेट में ले लेता है,
सुना है यह इश्क़ वाला वायरस हर साल फ़रवरी में फैलता है।

लॉटरी लगती है फूल वालों और दुकानदारों की,
बस अपने मरीज़ को यह कहीं का नहीं छोड़ता है।
यह इश्क़ वाला वायरस हर साल फ़रवरी में फैलता है।


meना 

Thursday, December 19, 2019

चार पंक्तियाँ (२)

                                                                                                                                         १८/१२/२०१९

प्रिय पाठकगण ,
नमस्कार। इस बार अवकाश कुछ ज़्यादा ही लम्बा हो गया जिसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। आज कुछ और कवितायेँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ, उम्मीद है आपको पसंद आएँगी।

१)      गृहिणी 

अक्सर जो बच जाता है 
या औरों को कम भाता है 
मैं खा लेती हूँ।
क्यूँ ?
क्यूँ कि अन्न की बर्बादी पसंद नहीं।

अक्सर जब खाना कम पड़ता है 
या हर कोई चाव से खता है 
मैं भूखी रह लेती हूँ।
क्यूँ ? 
क्यूँ  कि फिर से पकाना होता नहीं। 

                                          चार पंक्तियाँ 

१)  हर मुस्कुराता चेहरा ख़ुश हो यह ज़रूरी नहीं 
     कुछ चेहरे ख़ुशफ़हमी भी दे जाते हैं।

२)  अक्सर लोग हँसी मज़ाक में सच कह जाते हैं 
     और पूछने पर, बात टाल जाते हैं।

३)  इतने भी ना तारीफ़ों के पुल बाँधिये 
     के मैं ज़मीं पे चलना भूल जाऊँ।  

४)  ये कैसी कश्मकश है ज़हन में, ऐ ख़ुदा 
     ना रोकते बनता है, ना बरसते बनता है।

    या तो इतना ऊँचा उठा कि सब को सम देख पाऊँ 
    या फिर ज़मीन में गाड़ दे कि तुझमें ही रम जाऊँ।

५)  मत दिखा निवाला गर हाथ ही बांधने हों 
     अगर वाक़ई खिलाना है तो स्वयं प्रकट हो। 

meना