Friday, March 27, 2026

स्वीकृति से आकृति

 प्रिय पाठकगण,

मेरी प्रस्तुत कविता हर उस व्यक्ति के लिए है जो स्वयं से अधिक औरों के लिए जीता है। औरों के बारे में सोचता है। अथवा कहीं न कहीं किसी बात से डरता है। आप मेरे इन विचारों से कितना सहमत हैं अथवा आपके इस बारे में क्या विचार हैं, कमेंट करके अवश्य बताएँ। धन्यवाद 🙏🏻 


सुनो,

नकारात्मक, व्यर्थ, बेतुकी 

बातों को इनकार करो। 


मन को जो विचलित करें 

ऐसे विचारों को धुतकार करो। 


लोग क्या सोचेंगे, कहेंगे अथवा करेंगे 

इस चिंतन को दिल से बाहर करो। 


और, बदल ना सको जिनको 

ऐसी परिस्थिति अथवा व्यक्ति

को स्वीकार करो।


स्वयं को भी जैसी हो वैसी 

स्वीकार करो, meना। 


के स्वीकृति से आकृति बनेगी, 

आकृति प्रेम स्वरूप की,

आकृति तुम्हारे निज रूप की। 


meना

Tuesday, March 10, 2026

ख़ुशी

देखी, पर दिखी नहीं 

ढूंढी, पर मिली नहीं 

ख़ुशी, जो औरों की आँखों में देखनी चाही।


पर जब स्वयं पे निवेश किया

ख़ुद पे खर्च किया, वक़्त 

तब मिल गई ख़ुशी

जो भीतर थी मेरे 

जहाँ से वह कभी गई ही नहीं। 


meना