Sunday, April 5, 2026

मुझे इश्क़ है तुमसे …..

प्रिय पाठकगण, 

प्रस्तुत कविता मैंने 30/03/2026 के दिन लिखी थी। आप जैसे जैसे इस कविता को पढ़ेंगे, वैसे वैसे आपको इसे लिखने के पीछे का कारण समझ आ जाएगा। आशा करती हूँ कि आपको मेरी यह रचना भी पसंद आएगी। धन्यवाद 🙏🏻। 



जब भी आती हो, अपना दीवाना बनाती हो, क़सम से; 

कभी अचानक दिख जाना

कभी इंतज़ार करने पर भी ना आना 

तुम्हारी ये अदा भी पसंद है दिल से। 


जान ही निकाल देती हो;

अपनी मद्धम, कभी तीव्र चाल से। 

कैसा महसूस होता है तब

पूछो ना मेरा हाल रे। 


वो सौंधी खुशबू और चंचल हवा;

चलती है जब साथ तुम्हारे

कैसे रोकूँ ख़ुद को मिलने से

के दिल नहीं रहता बस में मेरे। 


लो, आज क़ुबूल करती हूँ; 

कि मुझे इश्क़ है तुमसे 

और तुम्हारे हर एक नाम से 

वर्षा, बरखा, वृष्टि, बारिश

पुकारूँ चाहे जिस नाम से। 


meना

Friday, March 27, 2026

स्वीकृति से आकृति

 प्रिय पाठकगण,

मेरी प्रस्तुत कविता हर उस व्यक्ति के लिए है जो स्वयं से अधिक औरों के लिए जीता है। औरों के बारे में सोचता है। अथवा कहीं न कहीं किसी बात से डरता है। आप मेरे इन विचारों से कितना सहमत हैं अथवा आपके इस बारे में क्या विचार हैं, कमेंट करके अवश्य बताएँ। धन्यवाद 🙏🏻 


सुनो,

नकारात्मक, व्यर्थ, बेतुकी 

बातों को इनकार करो। 


मन को जो विचलित करें 

ऐसे विचारों को धुतकार करो। 


लोग क्या सोचेंगे, कहेंगे अथवा करेंगे 

इस चिंतन को दिल से बाहर करो। 


और, बदल ना सको जिनको 

ऐसी परिस्थिति अथवा व्यक्ति

को स्वीकार करो।


स्वयं को भी जैसी हो वैसी 

स्वीकार करो, meना। 


के स्वीकृति से आकृति बनेगी, 

आकृति प्रेम स्वरूप की,

आकृति तुम्हारे निज रूप की। 


meना

Tuesday, March 10, 2026

ख़ुशी

देखी, पर दिखी नहीं 

ढूंढी, पर मिली नहीं 

ख़ुशी, जो औरों की आँखों में देखनी चाही।


पर जब स्वयं पे निवेश किया

ख़ुद पे खर्च किया, वक़्त 

तब मिल गई ख़ुशी

जो भीतर थी मेरे 

जहाँ से वह कभी गई ही नहीं। 


meना

Saturday, February 7, 2026

समर्पण

07/02/2026 


ज़िंदगी की नाव 🚣 हर बार सरल नहीं चलती 

कई बार, मनचाही मंज़िल नहीं मिलती। 

आसान नहीं होता तूफानों में डटे रहना 

के तूफानों से जीत सबको नहीं मिलती। 


तूफ़ान, परीक्षा हैं हमारे धैर्य और समर्पण की

सौंपना पड़ता है तब ख़ुद को उस तिनके की तरह

जिसे नदी के बहाव का सहारा है 

और भरोसा है कि नदी उसे डूबने नहीं देगी। 


meना 

Tuesday, November 25, 2025

शिखर ⛰️

२५/११/२०२५

प्रिय पाठकगण 

नमस्कार 🙏🏻

Blind Women’s Cricket Team द्वारा जीते गए प्रारंभिक टी२० वर्ल्ड कप से प्रेरित यह कविता उन सभी महिला खिलाड़ियों को समर्पित है जिन्होंने देश, राज्य या किसी भी स्तर पर खेले अपने खेल के द्वारा देश और परिवार का नाम रोशन किया है।🫡



शिखर 

शिखर तक के रास्ते सरल नहीं होते 🧗‍♂️

अक्सर सफलता से चूक जाते हैं;

जिनके इरादे अटल नहीं होते। 


meना

Monday, November 3, 2025

बिन मौसम बरसात ☔️

 03/11/2025

प्रिय पाठकगण, 

नमस्ते 🙏🏻 । आज शाम हुई तेज ( गरजती-बरसती) बारिश पे मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं। आशा करती हूँ आप भी मेरे इन विचारों से सहमत होंगे। 


बिन मौसम बरसात ☔️ 


तुम बरस रही हो या के डरा रही हो, ऐ बारिश 🌧️ ?

ज़रा तो ख़ौफ़ खाओ उस मालिक का

के यह नवंबर का महीना है, जुलाई का नहीं। 


सुनो; तुम यूँ बेख़ौफ़, खुले आम, कभी भी; न बरसा करो। 

जाओ, अब घर जाओ, थोड़ा तो विश्राम करो। 

के अगले साल फिर आना है तुम्हें; सज सँवर कर। 

तब तक बाक़ी ऋतुओं को भी; अपना जलवा दिखाने दो। 😊



meना 

Sunday, September 21, 2025

ऐ ज़िंदगी

 21/09/2025

प्रिय पाठकगण,

प्रणाम 🙏🏻। मेरी प्रस्तुत कविता दीपावली के आगमन से पहले की जानेवाली सफ़ाई से प्रेरित है। ख़ास कर उस एक विंड चाइम्स से प्रेरित है जो तेज़ हवाओं के चलते उलझ सी गई थी और इस वजह से उसके मधुर स्वर कम सुनाई देते थे।

 आशा करती हूँ कि मेरी यह कविता भी आपके दिलों को स्पर्श करेगी। आप सब के स्नेह और आशीर्वाद के लिए आपकी आभारी हूँ। कृपया अपने सुझाव और विचार कमेंट के ज़रिए अवश्य व्यक्त करें। धन्यवाद। 🙏🏻

(** हो सके तो कमेंट में अपना नाम ज़रूर लिखिएगा। इस से मुझे जवाब लिखने में आसानी होगी।)



  ज़िंदगी


आओ सुलझा दूँ तुम्हें

उलझनें मिटा दूँ तुम्हारी, ऐ ज़िन्दगी। 

हौले से, अपने अंतर्मन की गाँठें खोलूँ, ऐ ज़िन्दगी।


मन पर लगे जाले हैं जो 

आत्मा पर दिखते दाग से वो 

आज, ख़ुद से बैठ उनको साफ़ करूँ, ऐ ज़िंदगी।

आओ सुलझा दूँ तुम्हें, ऐ ज़िंदगी। 


कुछ रिश्ते नाज़ुक हैं

कुछ लोग ज़िद्दी हैं

बारी-बारी सबको संभालूँ , ऐ ज़िन्दगी। 

आओ सुलझा दूँ तुम्हें, ऐ ज़िंदगी। 


समय की गहराई में दब चुके हैं जो

कुछ भूले-बिसरे नाते हैं वो 

आज, उनपर से धूल हटाऊँ, ऐ ज़िंदगी। 

आओ सुलझा दूँ तुम्हें, ऐ ज़िंदगी। 


हर्षोल्लास की हवा से टकराकर 

फिर से अपनेपन और ख़ुशी के स्वर निकाले ऐसी 

उलझी विंड चाइम्स नुमा ज़िंदगी के धागे सुलझा दूँ, ऐ ज़िंदगी। 

आओ सुलझा दूँ तुम्हें, ऐ ज़िंदगी।



meना


** विंड चाइम्स - पवन घंटी